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प्रेमचंद की कहानी: नैराश्य लीला (पार्ट 3)

Posted On: 19 Dec, 2013 Hindi Sahitya में

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(कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की श्रृंखला में महिला चरित्रों की प्रभावशाली चरित्र-चित्रण की विशेषता दिखाने वाली कहानियों की पिछली कड़ी में आपने ‘बड़े घर की बेटी’ और ‘स्वामिनी’ पढा. इसी श्रृंखला हम आज लेकर आए हैं उनकी एक और कहानी ‘नैराश्य लीला’. उम्मीद है यह कड़ी पाठकों को पसंद आएगी. कहानी पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया का हमें इंतजार रहेगा.)

गतांक से आगे……

3

Premchand Storiesशनै:-शनै: यह विलासोन्माद शांत होने लगा. वासना का तिरस्कार किया जाने लगा. पंडितजी संध्या समय ग्रामोफोन न बजाकर कोई धर्म ग्रंथ पढ़कर सुनाते. स्वाध्याय, संयम, उपासना में मां-बेटी रत रहने लगीं. कैलासी को गुरु जी ने दीक्षा दी, मुहल्ले और बिरादरी की स्त्रियां आईं, उत्सव मनाया गया.


मां-बेटी अब किश्ती पर सैर करने के लिए गंगा न जातीं, बल्कि स्नान करने के लिए. मन्दिरों में नित्य जातीं. दोनों एकादशी का निर्जल व्रत रखने लगीं. कैलासी को गुरुजी नित्य संध्या-समय धर्मोपदेश करते. कुछ दिनों तक तो कैलासी को वह विचार-परिवर्तन बहुत कष्टजनक मालूम हुआ, पर धर्मनिष्ठा नारियों का स्वाभाविक गुण है, थोड़े ही दिनों में उसे धर्म से रुचि हो गई. अब उसे अपनी अवस्था का ज्ञान होने लगा था. विषय-वासना से चित्त आप ही आप खिंचने लगा. ‘पति’ का यथार्थ आशय समझ में आने लगा था. पति ही स्त्री का सच्चा मित्र, सच्चा पथ-प्रदर्शक और सच्चा सहायक है. पति विहीन होना किसी घोर पाप का प्रायश्चित्त है. मैंने पूर्वजन्म में कोई अकर्म किया होगा. पतिदेव जीवित होते तो मैं फिर माया में फंस जाती. प्रायश्चित्त का अवसर कहां मिलता. गुरुजी का वचन सत्य है कि परमात्मा ने तुम्हें पूर्वकर्मों के प्रायश्चित्त का यह अवसर दिया है. वैधव्य यातना नहीं है, जीवोद्धार का साधन है. मेरा उद्धार त्याग, विराग, भक्ति और उपासना से होगा.


कुछ दिनों के बाद उसकी धार्मिक वृत्ति इतनी प्रबल हो गई कि अन्य प्राणियों से वह पृथक रहने लगी. किसी को न छूती, महरियों से दूर रहती, सहेलियों से गले तक न मिलती, दिन में दो-दो, तीन-तीन बार स्नान करती, हमेशा कोई न कोई धर्म-ग्रंथ पढ़ा करती. साधु-महात्माओं के सेवा-सत्कार में उसे आत्मिक सुख प्राप्त होता. जहां किसी महात्मा के आने की खबर पाती, उनके दर्शनों के लिए विकल हो जाती. उनकी अमृतवाणी सुनने से जी न भरता. मन संसार से विरक्त होने लगा. तल्लीनता की अवस्था प्राप्त हो गई. घंटों ध्यान और चिंतन में मग्न रहती. सामाजिक बंधनों से घृणा हो गई. हृदय स्वाधीनता के लिए लालायित हो गया; यहां तक कि तीन ही बरसों में उसने संन्यास ग्रहण करने का निश्चय कर लिया.


मां-बाप को यह समाचार ज्ञात हुआ तो होश उड़ गए. मां बोली- बेटी, अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है कि तुम ऐसी बातें सोचती हो.


कैलासकुमारी- माया-मोह से जितनी जल्द निवृत्ति हो जाएं उतना ही अच्छा.

प्रेमचंद की कहानी: नैराश्य लीला (पार्ट 1)


हृदयनाथ- क्या अपने घर में रहकर माया-मोह से मुक्त नहीं हो सकती हो? माया-मोह का स्थान मन है, घर नहीं.


जागेश्वरी- कितनी बदनामी होगी.


कैलासकुमारी- अपने को भगवान के चरणों पर अर्पण कर चुकी तो बदनामी की क्या चिंता?


जागेश्वरी- बेटी, तुम्हें न हो, हमको तो है. हमें तो तुम्हारा ही सहारा है. तुमने जो संन्यास ले लिया तो हम किस आधार पर जियेंगे?


कैलासकुमारी- परमात्मा ही सबका आधार है. किसी दूसरे प्राणी का आश्रय लेना भूल है.


दूसरे दिन यह बात मुहल्लेवालों के कानों में पहुंच गई. जब कोई अवस्था असाध्य हो जाती है तो हम उस पर व्यंग्य करने लगते हैं. ‘यह तो होना ही था, नई बात क्या हुई, लड़कियों को इस तरह स्वच्छंद नहीं कर दिया जाता, फूले न समाते थे कि लड़की ने कुल का नाम उज्ज्वल कर दिया. पुराण पढ़ती है, उपनिषद् और वेदांत का पाठ करती है, धार्मिक समस्याओं पर ऐसी-ऐसी दलीलें करती है कि बड़े-बड़े विद्वानों की जबान बंद हो जाती है, तो अब क्यों पछताते हैं?’ भद्र पुरुषों में कई दिनों तक यही आलोचना होती रही. लेकिन जैसे अपने बच्चे के दौड़ते-दौड़ते धम से गिर पड़ने पर हम पहले क्रोध के आवेश में उसे झिड़कियां सुनाते हैं, इसके बाद गोद में बिठाकर आंसू पोंछने और फुसलाने लगते हैं; उसी तरह इन भद्र पुरुषों ने व्यंग्य के बाद इस गुत्थी के सुलझाने का उपाय सोचना शुरू किया. कई सज्जन हृदयनाथ के पास आये और सिर झुकाकर बैठ गए. विषय का आरंभ कैसे हो?


कई मिनट के बाद एक सज्जन ने कहा- सुना है डॉक्टर गौड़ का प्रस्ताव आज बहुमत से स्वीकृत हो गया.


दूसरे महाशय बोले- यह लोग हिंदू-धर्म का सर्वनाश करके छोड़ेंगे.


तीसरे महानुभाव ने फरमाया- सर्वनाश तो हो ही रहा है, अब और कोई क्या करेगा! जब हमारे साधु-महात्मा, जो हिंदू-जाति के स्तंभ हैं, इतने पतित हो गए हैं कि भोली-भाली युवतियों को बहकाने में संकोच नहीं करते तो सर्वनाश होने में रह ही क्या गया.


हृदयनाथ- यह विपत्ति तो मेरे सिर ही पड़ी हुई है. आप लोगों को तो मालूम होगा.

प्रेमचंद की कहानी: नैराश्य लीला (पार्ट 2)

पहले महाशय- आप ही के सिर क्यों, हम सभी के सिर पड़ी हुई है.


दूसरे महाशय- समस्त जाति के सिर कहिए.


हृदयनाथ- उद्धार का कोई उपाय सोचिए.


पहले महाशय- आपने समझाया नहीं?


हृदयनाथ- समझा के हार गया. कुछ सुनती ही नहीं.


तीसरे महाशय- पहले ही भूल हुई. उसे इस रास्ते पर डालना ही न चाहिए था.


पहले महाशय- उस पर पछताने से क्या होगा? सिर पर जो पड़ी है उसका उपाय सोचना चाहिए. आपने समाचार-पत्रों में देखा होगा, कुछ लोगों की सलाह है कि विधवाओं से अध्यापकों का काम लेना चाहिए. यद्यपि मैं इसे भी बहुत अच्छा नहीं समझता, पर संन्यासिनी बनने से तो कहीं अच्छा है. लड़की अपनी आंखों के सामने तो रहेगी. अभिप्राय केवल यही है कि कोई ऐसा काम होना चाहिए जिसमें लड़की का मन लगे. किसी अवलंब के बिना मनुष्य को भटक जाने की शंका सदैव बनी रहती है. जिस घर में कोई नहीं रहता उसमें चमगादड़ बसेरा लेते हैं.


दूसरे महाशय- सलाह तो अच्छी है. मुहल्ले की दस-पांच कन्याएं पढ़ने के लिए बुला ली जाएं. उन्हें किताबें, गुड़ियां आदि इनाम मिलता रहे तो बड़े शौक से आएंगी. लड़की का मन तो लग जायगा.


हृदयनाथ- देखना चाहिए. भरसक समझाऊंगा.


ज्यों ही यह लोग विदा हुए, हृदयनाथ ने कैलासकुमारी के सामने यह तज़वीज पेश की. कैलासी को संन्यस्त के उच्चपद के सामने अध्यापिका बनना अपमानजनक जान पड़ता था. कहां वह महात्माओं का सत्संग, वह पर्वतों की गुफा, वह सुरम्य प्राकृतिक दृश्य, वह हिमराशि की ज्ञानमय ज्योति, वह मानसरोवर और कैलास की शुभ्र छटा, वह आत्मदर्शन की विशाल कल्पनाएं, और कहां बालिकाओं को चिड़ियों की भांति पढ़ाना. लेकिन हृदयनाथ कई दिनों तक लगातार सेवाधर्म का माहात्म्य उसके हृदय पर अंकित करते रहे. सेवा ही वास्तविक संन्यास है. संन्यासी केवल अपनी मुक्ति का इच्छुक होता है, सेवा-व्रतधारी स्वयं की परमार्थ की वेदी पर बलि दे देता है. इसका गौरव कहीं अधिक है. देखो, ऋषियों में दधीचि का जो यश है, हरिश्चंद्र की जो कीर्ति है, उसकी तुलना और कहां की जा सकती है. संन्यास स्वार्थ है, सेवा त्याग है, आदि. उन्होंने इस कथन की उपनिषदों और वेदमंत्रों से पुष्टि की. यहां तक कि धीरे-धीरे कैलासी के विचारों में परिवर्तन होने लगा. पंडितजी ने मुहल्लेवालों की लड़कियों को एकत्र किया, पाठशाला का जन्म हो गया. नाना प्रकार के चित्र और खिलौने मंगाए. पंडितजी स्वयं कैलासकुमारी के साथ लड़कियों को पढ़ाते. कन्याएं शौक से आतीं. उन्हें यहां की पढ़ाई खेल मालूम होती. थोड़े ही दिनों में पाठशाला की धूम हो गई, अन्य मुहल्लों की कन्याएं भी आने लगीं.

(शेष अगले अंक में……)


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